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बुधवार, 29 दिसंबर 2010

कोहरे भइया


बाल गीत : डा. नागेश पांडेय ' संजय ' 
छायाकार : डॉ. रूपचंद्र शास्त्री "मयंक"

कोहरे भइया, हटो अगर,
तो बाहर आऊँ।
विद्यालय को देर हुई,
झटपट मैं जाऊँ।

दिखता  चारों ओर सिर्फ
घनघोर अँधेरा।
हम कहते -‘है रात अभी’,
माँ कहें -‘सवेरा’।
घड़ी उन्हीं की ओर,
उसे कैसे समझाऊँ ?

पता न चलता-कहाँ, किधर,
खो गई डगर है ?
ऐसे में गर निकलूँ तो
टक्कर का डर है।
जानबूझ कर, गलती कर,
क्यों कष्ट उठाऊँ ?

सूरज दादा ! अभी नहीं
निकले हैं बाहर,
उनके आते ही भागोगे
पूँछ दबाकर।
जाते हो या फिर ‘दादा’
को टेर लगाऊँ।

5 टिप्‍पणियां:

sheelu ने कहा…

गीत बहुत ही रोचक .

एस.एम.मासूम ने कहा…

सूरज दादा ! अभी नहीं
निकले हैं बाहर,
उनके आते ही भागोगे
पूँछ दबाकर।
जाते हो या फिर ‘दादा’
को टेर लगाऊँ
.

बहुत खूब कह है

virendra ने कहा…

kohore bhyia kavita ball mano bigiyan ko ujagar krte huya hame baccapan ki yado me le ja kar chod dati hai
This poem is very nice

siraj ahmad ने कहा…

बहुत सुंदर सर।

siraj ahmad ने कहा…

बहुत सुंदर सर।