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बुधवार, 5 जनवरी 2011

जाड़े की रात

जाड़े की रात
बाल गीत : डा. नागेश पांडेय 'संजय' 


     
    ओ जाड़े की रात बात यह मेरे समझ न आई,
     अकस्मात बढ़ गई तुम्हारी कैसे यह लम्बाई ?

परी मिली क्या कोई जिसने,
जादू यह सिखलाया ?
या फिर तुमने खुद ही कोई
हुनर अनोखा पाया ।
क्या लम्बा कर देने वाली ‘टेबलेट’ है खाई ?

वैसे तेरा बढ़ जाना तो,
सबको खूब सुहाया।
जाड़े में खर्राटे भरकर
मिलता मजा सवाया।
तबियत नहीं किसी की रहती अलसाई-अलसाई।

तेरे बढ़ने से हम बच्चे,
जमकर मौज मनाते,
जी भर सोते और खुशी से,
चार बजे उठ जाते।
कर लेते हैं बड़े मजे से अपनी खूब पढ़ाई  .

चित्र में : पाखी , अंडमान निकोबार 

3 टिप्‍पणियां:

Akshita (Pakhi) ने कहा…

बहुत प्यारा बाल-गीत....मजा आ गया पढ़कर.
______________

'पाखी की दुनिया' में आपका स्वागत है.

Akshita (Pakhi) ने कहा…

आपने मेरी फोटो लगाई, अच्छा लगा. किसी दिन मेरे लिए इक प्यारी सी कविता भी लिखियेगा, फिर मैं उसे अपने ब्लॉग पर लगाउंगी . आपको ढेर सारा प्यार.

माधव( Madhav) ने कहा…

सुंदर गीत , मजा आ गया