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शुक्रवार, 20 जनवरी 2012

ठंड लग रही (बालगीत) : नागेश पांडेय 'संजय'

ठंड लग रही
बाल गीत : डा. नागेश पांडेय 'संजय'
ओ अम्मा ! दो मुझे रजाई , 
ठंड लग रही है . 

देखो गठरी बना हुआ मैं 
कंबल के अंदर . 
ठिठुर रहा है , मेरा सारा 
तन थर-थर-थर .
और दाँत कर रहे लड़ाई , 
ठंड लग रही है . 

चुपके से तुमको बतला दूँ , 
नाक बह रही है . 
कल सर्दी में घूमा था मैं , 
राज कह रही है . 
हालत है मेरी चकराई , 
ठंड लग रही है . 

अदरक वाली चाय बना दो , 
मुझको झट-पट-चट  . 
पलक झपकते पी जाऊँ  मैं , 
उसको गट-गट-गट. 
उस से रहत मिले सवाई ,
ठंड लग रही है .
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चित्र में कुबेर मिश्र 

4 टिप्‍पणियां:

चैतन्य शर्मा ने कहा…

बड़ी मजेदार ....प्यारी है ठण्ड की कविता.....

ajit gupta ने कहा…

अभी से बच्‍चे को अदरक वाली चाय पिला रहे हैं? बढिया है भाई।

माधव( Madhav) ने कहा…

मुझे भी ठण्ड लग रही है

प्रतुल वशिष्ठ ने कहा…

बाल-इच्छाओं को पहचानना और उसे शब्द देना अत्यंत संवेदनशील के बस की ही बात है।


आनंद वर्षा करता गीत "ठण्ड लग रही है"


वाह वाह !! बहुत सुखकर !!!