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मंगलवार, 17 मई 2011

मई महीना



 
बाल कविता : डॉ. नागेश पांडेय 'संजय' 
मई महीना 
देख सभी के 
छुटता ढेर पसीना . 
मुख से यही 
निकलता सबके 
हाय कठिन अब जीना . 
सर-सर 
आंधी चलती ,
लगते लू के 
गरम थपेड़े .
सूरज दादा तो
अब हरदम
रहते आँख तरेरे . 
प्यास न बुझती
बार-बार 
पानी पड़ता है पीना. 
जाड़ो के 
ठिगने से दिन 
अब हुए 
ताड़ से लंबे . 
अब तो पल 
काटे न कटते 
बने लौह
 के खंभे .
धरती कहती -
नभ  से बरसो , 
अब तो बरसो भी ना . 

8 टिप्‍पणियां:

चैतन्य शर्मा ने कहा…

अच्छी लगी कविता

Kailash C Sharma ने कहा…

बहुत सुन्दर रचना..

Coral ने कहा…

बहुत सुन्दर ....

Patali-The-Village ने कहा…

बहुत सुन्दर रचना| धन्यवाद|

बलराम ने कहा…

रोचक और बेहद ही मजेदार गीत

Dinesh pareek ने कहा…

बहुत ही सुन्दर लिखा है अपने इस मैं कमी निकलना मेरे बस की बात नहीं है क्यों की मैं तो खुद १ नया ब्लोगर हु
बहुत दिनों से मैं ब्लॉग पे आया हु और फिर इसका मुझे खामियाजा भी भुगतना पड़ा क्यों की जब मैं खुद किसी के ब्लॉग पे नहीं गया तो दुसरे बंधू क्यों आयें गे इस के लिए मैं आप सब भाइयो और बहनों से माफ़ी मागता हु मेरे नहीं आने की भी १ वजह ये रही थी की ३१ मार्च के कुछ काम में में व्यस्त होने की वजह से नहीं आ पाया
पर मैने अपने ब्लॉग पे बहुत सायरी पोस्ट पे पहले ही कर दी थी लेकिन आप भाइयो का सहयोग नहीं मिल पाने की वजह से मैं थोरा दुखी जरुर हुआ हु
धन्यवाद्
दिनेश पारीक
http://kuchtumkahokuchmekahu.blogspot.com/
http://vangaydinesh.blogspot.com/

Dinesh pareek ने कहा…

बहुत ही सुन्दर लिखा है अपने इस मैं कमी निकलना मेरे बस की बात नहीं है क्यों की मैं तो खुद १ नया ब्लोगर हु
बहुत दिनों से मैं ब्लॉग पे आया हु और फिर इसका मुझे खामियाजा भी भुगतना पड़ा क्यों की जब मैं खुद किसी के ब्लॉग पे नहीं गया तो दुसरे बंधू क्यों आयें गे इस के लिए मैं आप सब भाइयो और बहनों से माफ़ी मागता हु मेरे नहीं आने की भी १ वजह ये रही थी की ३१ मार्च के कुछ काम में में व्यस्त होने की वजह से नहीं आ पाया
पर मैने अपने ब्लॉग पे बहुत सायरी पोस्ट पे पहले ही कर दी थी लेकिन आप भाइयो का सहयोग नहीं मिल पाने की वजह से मैं थोरा दुखी जरुर हुआ हु
धन्यवाद्
दिनेश पारीक
http://kuchtumkahokuchmekahu.blogspot.com/
http://vangaydinesh.blogspot.com/

shikha varshney ने कहा…

सुन्दर बाल गीत लगे.