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मंगलवार, 28 जून 2011

बादल, बादल ! जल बरसा


बालगीत : डा. नागेश पांडेय ' संजय '
नीले आसमान पर छा,
बादल , बादल ! जल बरसा।


देख, धरा अकुलायी है,
तुझ पर दृष्टि जमायी है,
क्यों कर रहा ढिलाई है?
गड़-गड़, गड़-गड़ कर झट आ,
बादल , बादल ! जल बरसा।
गांव-शहर, छत-छप्पर पर,
खूब बरस तू झमर-झमर
पेड़-पौधे को, धरती को
नया रूप, नव रंग दिला,
 बादल , बादल ! जल बरसा।
पपिहा-चातक चहकेंगे,
मोर मस्त हो बहकेंगे
फूल बाग में बहकेंगे,
अब न तनिक तू देर लगा,
बादल,बादल ! जल बरसा।
पाएँगे सब सुख भारी,
होंगे तेरे आभारी
तुझसे बड़ा न उपकारी
तू बस निज करतब दिखला
बादल , बादल ! जल बरसा।

8 टिप्‍पणियां:

ममता त्रिपाठी ने कहा…

अनुप्रासा का अच्छा प्रयोग कर कविता को बहुत ध्वन्यात्मक बना दिया है।
शोभनम्

Kailash C Sharma ने कहा…

बहुत सुन्दर..

Mukesh Kumar Mishra ने कहा…

बहुत सुन्दर रचना

गांव-शहर, छत-छप्पर पर,
खूब बरस तू झमर-झमर
पेड़-पौधे को, धरती को
नया रूप, नव रंग दिला,


नादसौन्दर्य सराहनीय है।

Maheshwari kaneri ने कहा…

गांव-शहर, छत-छप्पर पर,
खूब बरस तू झमर-झमर
पेड़-पौधे को, धरती को
नया रूप, नव रंग दिला,...बहुत सुन्दर रचना

चैतन्य शर्मा ने कहा…

बहुत सुन्दर कविता...

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक (उच्चारण) ने कहा…

रचना पढ़कर और जलकी बरसती बूऩ्दों को देखकर अच्छा लगा रहा है!

ईं.प्रदीप कुमार साहनी ने कहा…

पाएँगे सब सुख भारी,
होंगे तेरे आभारी
तुझसे बड़ा न उपकारी
तू बस निज करतब दिखला
बादल , बादल ! जल बरसा।

बहुत अच्छी लगी आपकी यह रचना |
साथ ही मेरे ब्लॉग पर आकर अपनी टिपण्णी से हौसला बढ़ने के लिए धन्यवाद् | इसी तरह स्नेह बनाये रखें और मेरे ब्लॉग में आते रहें |
साथ ही मेरी रचनाएँ अगर ठीक थक लग रही हों तो ब्लॉग को जरुर फोलो करें |
आभार |

http://www.pradip13m.blogspot.com/

संगीता स्वरुप ( गीत ) ने कहा…

बहुत सुन्दर बालकविता