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गुरुवार, 11 अगस्त 2011

हाँ , मैं बन्दर हूँ (बाल लघुकथा) : डा. नागेश पांडेय ' संजय '


हाँ , मैं बन्दर हूँ  

         राजू अपने दोस्तों के साथ खेल रहा था . 
    उसकी आँखों पर  पट्टी बँधी थी.
     वह कभी इधर तो कभी उधर भागता .
      सारे बच्चे ही-ही , हो- हो करते 
      खुद को उससे बचाकर खुश हो रहे थे .                      

    अचानक राजू ने मोनू को पकड़ लिया . 
           सारे बच्चे हँसे -" हो, हो ,हो . मोनू तुम पकडे गए .
          अब जल्दी से आँखों पर  पट्टी बाँधो . बनो चोर ".

            बेचारा मोनू .
           वह चिढकर बोला -  "पकड़ ही लिया बन्दर ने . "
            अब क्या था , बच्चे और जोर से हँस पड़े -
 " राजू ... तुम बन्दर .तुम बन्दर हो . "
            मगर राजू , वह बिलकुल नहीं चिढ़ा . 
         चहक कर बोला -  "हाँ , हाँ . मैं बन्दर हूँ .
मगर हूँ गाँधी जी का बन्दर .
            और ... ये ? ... ये तो मदारी का बन्दर है . 
चल बाँध जल्दी से पट्टी . "
मोनू  चुपचाप आगे बढ़ा . 
खेल फिर शुरू हो गया .
चित्र साभार : गूगल सर्च 

2 टिप्‍पणियां:

डॉ॰ मोनिका शर्मा ने कहा…

सुंदर बाल कथा ...

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक (उच्चारण) ने कहा…

बहुत अच्छी प्रस्तुति है!
रक्षाबन्धन के पावन पर्व पर हार्दिक शुभकामनाएँ!