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रविवार, 2 अप्रैल 2017

बाल गीत/ डॉ. नागेश पांडेय 'संजय' - फूलों का स्कूल


बाल गीत/ डॉ. नागेश पांडेय 'संजय'

फूलों का स्कूल खुला है,

फूलो का स्कूल।



बगिया में ही क्लास लगी है,
खूब पढ़ेंगे, आस जगी है।
साफ-सफाई खूब चकाचक,
नहीं जरा-सी धूल।



जूही, चम्पा और चमेली,
सब बेला की बनी सहेली।
सूर्यमुखी, गेंदा, गुलाब सब
रहे ख़ुशी से झूल।



गुड़हल, हरसिंगार चहकते;
खुश हो कमल-कनेर बहकते।
टेसू, सेमल पूछ रहे हैं-
'किन फूलों में शूल ?'

टीचर इनके सूरज दादा,

पाठ पढ़ाते सीधा-सादा।
'नही समय से बढकर कुछ भी,
कभी न जाना भूल।'



मैडम हवा इन्हें दुलरातीं,
गोदी में हैं इन्हें झुलातीं।
कहतीं जग को महकाने में,
रहो सदा मशगूल।



सचमुच फूल बहुत ही प्यारे,
धरती की आँखों के तारे।
डाली पर लटके थक जाते,
मिले इन्हें स्टूल।



फूलों का स्कूल निराला,
रंग-बिरंगा, खुशबू वाला।
बिन बस्ते के, यहाँ पढ़ाई
वाला नया उसूल।



फूलों का स्कूल खुला है,
फूलों का स्कूल।
चित्र साभार गूगल सर्च 

1 टिप्पणी:

रूपचन्द्र शास्त्री मयंक ने कहा…

आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल मंगलवार (04-04-2017) को

"जिन्दगी का गणित" (चर्चा अंक-2614)
पर भी होगी।
--
सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है।
विक्रमी सम्वत् 2074 की
हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
सादर...!
डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'