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रविवार, 19 दिसंबर 2010

उड़न खटोला

डा. नागेश पांडेय 'संजय' 













उड़न  खटोला उड़न  खटोला . 

देखा इसे पहाड़ पर , 
लटका था जी तार पर .
बढा जा रहा था उपर , 
घरर घरर घर घरर घरर .
मैं भी बैठूँगा  मैं बोला .

पापाजी ने लिया टिकट ,
खुश  होकर मैं गया निकट .
अचरज से आंखे थी चार ,
मन में उमड़   रहा था प्यार .
मैंने झट दरवाजा खोला .

बैठ गया खिड़की  के पास ,
समझ रहा था खुद को खास .
पर जब नीचे गयी नजर ,
कांप उठा मैं थर थर थर .
क्यों बैठा मेरा मन डोला !

उफ ! कितनी उचाई थी ,
नीचे गहरी खाई थी .
लोग बजाते थे सीटी ,
लगते थे जैसे चीटी .
जब पहुँचा तब चहका चोला .

2 टिप्‍पणियां:

रावेंद्रकुमार रवि ने कहा…

उड़नखटोला पर मैंने
इतनी बेहतरीन कविता
इससे पहले कभी नहीं पढ़ी!

Suchitra ने कहा…

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