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गुरुवार, 23 अप्रैल 2020

पुस्तक प्रेम पर कविता : नागेश पांडेय 'संजय'

बहुत प्यार है
कविता : नागेश पांडेय 'संजय'
समझ झरोखा, मासिक, मध्य प्रदेश शासन, मार्च 1994 अंक में प्रकाशित कविता

बुधवार, 15 अप्रैल 2020

कविता 'हारेगा कोरोना'

हारेगा कोरोना


कविता : डॉ. नागेश पांडेय 'संजय'

हारेगा कोरोना बिल्कुल
हारेगा कोरोना।

सच है, कोरोना के आगे
बनी हुई लाचारी।
सारी दुनियाँ कोशिश पर
कोशिश करके है हारी।

लेकिन आशावान रहे हम,
मन से आहत हो ना

धोकर हाथ चलो अब इसके
पीछे हम पड़ जाए।
इसको विफल करेंगे मिलकर,
 हम सब अब अड़ जाएं।
ध्यान रहे अपने हाथों को
बार बार है धोना।

कोरोना को नहीं पता है,
जाति धर्म मजहब क्या?
यह तो जीवन का दुश्मन है,
समझ गए हो अब क्या?

इसको अवसर अगर दिया तो,
बहुत पड़ेगा रोना।

मन के हारे हार सदा है,
मन के जीते जीत।
मन के तारों से हम छेड़े,
जीवन का संगीत।
मन उपवन में आशाओं के,
सुमन हजारों बोना।

रहें सजग हम, सावधान हम,
दुश्मन बहुत बली है।
एक बड़ी आबादी इसने,
पल भर में निगली है।
कैसे यह कमजोर बने अब,
शपथ हृदय से लो ना।

घर पर रहें, व्यर्थ मत निकले,
बात भली यह माने।
इसकी चैन न बनने देंगे
हम सब मन में ठाने।
जो गलती जग करता आया,
वह गलती अब हो ना।

सब आरोग्य सेतु को निश्चित
डाउनलोड करेंगे।
कहीं न पैनिक फैले बिल्कुल
इसका ध्यान धरेंगे।
सजग नागरिक बनकर इसको
सब कमजोर करो ना।

है हमको विश्वास साथियों,
होगी जीत हमारी।
कोरोना हारेगा देखेगी,
यह  दुनिया सारी।
फिर से सबके ही दिन बहुरें,
महके कोना कोना।
हारेगा कोरोना, बिल्कुल
हारेगा कोरोना।

डॉ. नागेश पांडेय 'संजय'
प्राध्यापक एवम
विभागाध्यक्ष,
शिक्षक शिक्षा विभाग,
आर. पी. कालेज, मीरगंज, बरेली 

शुक्रवार, 18 अक्तूबर 2019

कहानी : नेहा की दीदी-डॉ. नागेश पांडेय 'संजय'

नेहा की दीदी
- डॉ० नागेश पांडेय ‘संजय’
दीदी, जो नेहा को कभी अच्छी नहीं लगीं, बहुत प्यारी लगने लगीं
है। वह कनखियों से उन्हें देखती है, उन्हें देखते-देखते
गुमसुम सी हो जाती है। अकेले में उनके बारे में सोचती
है-सोचती है-सोचती है... सोचती जाती है...और ...और छल्ल से
आँसू टपक पड़ते हैं। आँसुओं की धार फूट पड़ती है।
दीदी चली जाएँगी।
इक्कीस को दीदी की शादी है। आज पाँच है, सोलह दिन शेष। कल
पंद्रह दिन शेष रहेंगे। फिर चौदह, तेरह, बारह और फिर...और फिर...!
नेहा पिछले दो महीने से एक-एक करके दिन गिन रही है।
दीदी चली जाएंँगी।
दीदी नेहा से कोई बारह साल बड़ी हैं। नेहा सात में पढ़ती
है। उम्र यही होगी बारह या तेरह। उसकी रुचि पढ़ने में है और
दोस्ती में। दोस्ती ऐसी सहेलियों से जो फुल इंज्वाय करें।
बैठें, गप्पें लड़ाएँ। कुछ इधर की, कुछ उधर की। कुछ खट्टी,
कुछ मीठी। अरे, अभी उम्र ही क्या है जो जिंदगी भर के जंजाल के
बारे में सोचा जाए। रोटी कैसे बने? हलवा कैसे बने? कढ़ाई कैसे
हो-तुरपाई कैसे हो? पापड़ चिप्स, ढोकला, डोसा कैसे बनेगा?... अरे,
क्या करना है जी। नेहा को तो चाय बनाना भी नहीं आता। माँ ने एक
बार हँस कर कहा था, ‘‘सास बहुत मारेगी। चाय बनाना भी नहीं आता।’’
और नेहा ने लपकते अंदाज में जबाव दिया था, ‘‘टी इज इंज्यूरियस टू
हेल्थ। अरे, दूध पिलाऊँगी सासू को। दूध...दूध...दूध....
हड्डी मजबूत।’’
बातों को बनाना, छौंकना और पकाना नेहा को आता है। बस।


दीदी से इसीलिए उसका छत्तीस का आँकड़ा था। जब देखो, काम
में जुटी रहती हैं। जुटे भी क्यों न ? सब कुछ तो आता है जी।
नहीं आता तो सीखने के लिए तुरंत तत्पर। राइटिंग-वाह! जैसे मोती
जड़े हों। किसी को चिट्ठी-विट्ठी या कुछ भी लिखाना हो तो
दौड़ा चला आता है- ‘‘दीदी, तुम्हारी राइटिंग बहुत अच्छी है,
लिख दो न।’’
पाक कला-वाह! फाइव स्टार होटल के कुक की भी परनानी हैं। सब
कुछ अजीज और लजीज तैयार करती हैं, वह भी फटाफट। तो जूझो
हरदम। घर में सब उन्हीं से बनवाते हैं। अरे, बिटिया से बनवाओ,
उसका तो जबाव नहीं। कभी-कभी पड़ोस से भी फरमाइशें आती
हैं-बिटिया को भेज दो। ढोकले बनवाने हैं या ऐसा ही कुछ
और।
कढ़ाई-बुनाई- वाह! वाह! वाह! तभी तो आँखों पर चश्मा
चढ़ा है। कभी मौसा का स्वेटर, कभी चाचा का। कभी बगल से
कोई आता है-अच्छा, फंदे तुम डाल दो, बुन हम लेंगे। कोई
कहेगा फ्रंट वाला पल्ला तुम बुन दो न! वो कोने में जो चार लिहाफ
रखे हुए हैं, हाँ... हाँ इन्हीं के स्वागत में। शादी में भी फुरसत
नहीं।
नेहा तो कहा करती थी-शादी में हलवाई को आर्डर मत देना,
इन्हीं से कहना। बाराती उँगली चाटेंगे। कहो, उँगली
चाटते-चाटते खा ही न जाएँ।
और दीदी मारने दौड़ती-ठहर, ठहर जरा।
किससे करेगी ये सब अठखेलियाँ ?
दीदी चली जाएँगी।
दीदी, वास्तव में नेहा को कभी अच्छी नहीं लगी। सब उसे दीदी
से तौलते हैं। अरे! इसे भी कुछ सिखाओ। बिटिया, तू भी तो कुछ
सीख।
जब सीखने का वक्त आएगा, तब सीखेंगे न। क्या जल्दी है ? और फिर
नहीं भी सीखेंगे, तो क्या ! जमाना फास्ट है। रेडीमेड जमाना।
हमीं सब कुछ सीख लेंगे तो बेचारे मार्केटवाले क्या करेंगे ?

जब तक डोसा, समोसा बनाने की सोंचे और करें तब तक मार्केट से
दस बार आ सकता है।
दीदी मशीन चलाती हैं, कपड़े सिलती हैं। बाजार वाली
चकाचौंध उनमें कभी नहीं आ पाती। मँहगे भी तो पड़ते हैं।
अरे, क्या करना है। दो मिनट का काम है जी। दुकान पर उलटा-पलटा
और हो गया सलेक्शन, वह भी मनमाफिक। अब दीदी लाख चिल्लाती
रहें, जींस-टीशर्ट कभी सलवार कुर्ता की जगह नहीं ले सकता। न ले।
जमाना फास्ट है। लड़कों की बराबरी करनी है।
याद आया। इसी बात पर उस दिन नेहा और दीदी में अनबन हो गई
थी।
दीदी : बराबरी क्या लड़कों की नकल करने से होगी। उनके बाल
कटे हैं, हम भी कटा लें। वे शर्ट-पैंट पहनते हैं तो हम भी
पहनें। अरे, वे क्यां नकल नहीं करते हमारी ? बढ़ाएँ बाल, पहने
सलवार-सूट।
‘‘हाँ, हाँ पहनेंगे। पहनेंगे। बाल तो बढ़ा ही लिए हैं।’’
नेहा जोर से हँसी थी।
जबाव नहीं था दीदी के पास।
नेहा जबाव नहीं देती। मगर जब देती है तो यह सच है, दीदी के पास
जबाव नहीं बचता।
अरे, फिजूल की बातें करती रहती है।
‘‘धीमे बोला करो। आवाज बाहर न जाए।’’
- क्यों न जाए, जी! और फिर वह कोई मोबाइल फोन तो नहीं
है जो वाल्यूम लेवल कम कर ले।
‘‘तुम बड़ी हो गई हो। लॉन में रस्सी लेकर न कूदा करो।’’
- तो, ... तो क्या घर में कूदें, कमरे में।... ... इसके लिए केबिन
बनवाएँ क्या।
पता नहीं, दीदी की बुद्धि कैसी है जी। कहने को पी-एच. डी.
हैं। कालेज में पढ़ाती हैं। ये तो आज की लड़कियों को बेकार कर
देंगी।

नेहा, इसीलिए जब उन्हें आता देखती है तो मुस्कान छूटती है -
आ गईं डॉक्टर साहिबा! फिजीशियन एंड सर्जन। शरीर कैसा रखो, यह
बताएँगी। कुछ कहो, तो बातों का आपरेशन करेंगी।
इधर दीदी चुपचाप काम में लगी हैं। दादी का, मम्मी का सहयोग कर
रही हैं। अब वह नेहा से कुछ नहीं कहतीं। उसे डाँटती भी नहीं,
न कोई सुझाव देती हैं।
नेहा को लग रहा है, कुछ है जो छूट रहा है।
... ... दीदी, चली जाएँगी।
वह दीदी से बात करना चाहती है, कहे क्या ?
दो दिन शेष हैं।
... ... अब एक दिन।
... ... आज शादी है ... कल ... दीदी चली जाएँगी।
कल यानि चौबीस घंटे शेष। तेईस, बाइस... .... अट्ठारह, अब
सत्तरह, ... ... तेरह... ... बारह, सिर्फ बारह घंटे।
शाम का समय है, जयमाल का कार्यक्रम। सच! जोड़ी कितनी फब रही है।
लकी हैं दीदी। जीजाजी भी कितने सहज। पूरा परिवार सहज। कुछ नहीं
माँगा। कहा-बहू तो खुद खजाना है।
सब कितने खुश हैं... ...
चहल-पहल, नाच-गाना, खावा-पीवी।
नेहा को कुछ अच्छा नहीं लग रहा! ... ... दीदी ... ...
नेहा को लग रहा है, सुबह के आठ जैसे बजने ही वाले हैं। दीदी
चल देंगी। सब रोएँगे... ...जोर-जोर से। और वह... ... वह तो ...। वह
जब गले लगेगी तो शायद दीदी यही कहें - ‘‘लो, नेहा। अब तुम्हें
कोई कुछ नहीं कहेगा।’’
धाँय-ताड़, धाँय-ताड़।
आतिशबाजी शुरू हो गई। ... पर ... आतिशबाजी ? वह तो पापा ने मना
किया था ... ... ! फिर... ...?
‘‘खबरदार जो कोई हिला। अभी मौत की माला गले में
डाल दूँगा।’’
सात-आठ नकाबपोश, सब के सब हथियार लैस।
पंडाल शांत।

सब के सब किंकर्त्व्यविमूढ़। जैसे ढेरों मूर्तियाँ किसी संग्रहालय
में स्थापित हों।
‘‘क्यों बरखुरदार! शादी में एक पैसा नहीं ले रहे? दहेज रहित विवाह
! दुनिया की आँखों में धूल झोंक सकते हो, हमारी आँखों में
नहीं।’’
और वह लंबा-चौड़ा छह फुटी बदमाश लड़के के पिता को
छोड़ नेहा के पिता की ओर हो लिया -‘‘कितना दे रहे हो बैक डोर
से ? अरे, इन्हें नहीं चाहिए तो मुझे दे दो ... ...। देर नहीं ... ...,
हाँ, जल्दी ...।’’
‘‘प... ... प ... ...। ’’ पापा के मुँह से बोल नहीं फूट रहे थे।
पंडाल में सैकड़ों लोग। पर सब तमाशबीन। सर्द मौसम में सब
पसीने-पसीने। अचानक दीदी उठती हैं - ‘‘पापा, क्या चाहते हैं आप?
मेरी जिंदगी में जहर घोल देंगे क्या ?’’ और वे आगे बढ़ती हैं -
‘‘प्लीज पापा, वह ब्रीफकेस इन्हें दे दीजिए।’’ वह बिल्कुल पास आती हैं
- ‘‘आइए, आइए भाई साहब।’’ और अचानक एक गाय जैसे शेरनी का रूप
धारण कर लेती है। रिवाल्वर अब दीदी के हाथ में है। वह आदमी
नीचे।
 -‘‘सारी की सारी गोलियाँ भेजे में उतार दूँगी। बोल ... ...।’’
कोई कुछ बोलता नहीं। सभी साथी बंदूकें फेंक देते
हैं। भीड़ ने उन्हें दबोच लिया है।
कोई एक घंटे में : सब पुलिस कस्टडी में।
जयमाल का कार्यक्रम फिर से शुरू।
नेहा को लग रहा है। कोई माडर्न नहीं बन पाया। माडर्न तो
दीदी हैं।
दीदी तो लाजबाव हैं।
सुबह के आठ।
नेहा को जरा भी शिकन नहीं। दीदी चली जाएँगी।
आज घर में सारे अखबार आए हैं, सब में दीदी का बड़ा-सा फोटो
छपा है - बड़ा-सा समाचार।
नेहा तैयारी में जुटी है।
दीदी को विदा जो करना है।

नेहा दीदी से कहती है - ‘‘दीदी, मैं भी तुम्हारे साथ चलूँ ?
तुमसे तो बहुत कुछ सीखना है।’’
दीदी हँसकर कहती हैं - ‘‘अपने जीजाजी से पूछ। वे ‘दहेज’ के सख्त
खिलाफ हैं।’’
नेहा लजाकर रह जाती है। आज उसके पास कोई जबाव नहीं है।

मंगलवार, 19 फ़रवरी 2019

कविता "वसंत ऋतु" : डॉ. नागेश पांडेय 'संजय'

लो, वसंत की ऋतु आई है।

लगे परी-सी धरती रानी,
देख इसे होती हैरानी !
चहक उठी है, महक उठी है,
बहक उठी है प्रकृति सुहानी।
पेड़ झूमते हैं मस्ती में,
डाली-डाली बौराई है।
लो, वसंत की ऋतु आई है।

फूलों से लद गए बगीचे,
खुश्बू मन का आँगन सींचे।
यो लगता है गगन धरा पर,
अंजुरि भर-भर ख़ुशी उलीचे।
अहा ! जादुई इस मौसम का,
रंग-ढंग सब सुखदाई है।
लो, वसंत की ऋतु आई है।

झूम रही सरसों मतवाली,
नाच रही सरसों की बाली,
नन्हे-मुन्ने पौध चने के,
हँस-हँस बजा रहे हैं ताली।
कोयल भैया ने कूSS कूSS कूSS ,
मीठी-सी लोरी गाई है।
लो, वसंत की ऋतु आई है।

गुरुवार, 14 जनवरी 2016

हास्य नाट्य रूपक : चूहे के पेट में चूहे कूदे - डाॅ. नागेश पांडेय ‘संजय’

चूहे के पेट में चूहे कूदे
*****************-
- डाॅ. नागेश पांडेय ‘संजय’



(इस हास्य नाट्य रूपक में केवल 5 पात्र हैं। बच्चे इनका अभिनय सहजता से कर सकते हैं। नेपथ्य में उदघोषक तोता जी  कथा को प्रस्तुत करेंगे और पात्र उनके कथनानुसार अनुकरण/ अभिनय करेंगे। संवाद अभिनय कर रहे बच्चे भी बोल सकते हैं अथवा वाचक ही संवादों को भी बोलते रहेंगे और बच्चे उसके अनुरूप अभिनय करते रहेगे।)

स्थान - बरगद का पेड़। उसके नीचे एक घर। (यह द्रश्य परदे के माध्यम से भी सम्भव है। पेड़ कोई और भी हो सकता है। जैसी सुविधा रहे। मंच की सज्जा अपनी सुविधानुसार की जा सकती है ।)

पात्र - 
चुनुआ- नन्हा चूहा
चुहिया- चुनुआ की मम्मी
बिल्ला- धूर्त बिल्ला
कुत्ते दादा- 

समय- दोपहर 
------------------

बरगद के पेड़ के नीचे एक बिल था। उसमें एक चुहिया रहती थी। उसका नन्हा-सा एक बच्चा था। बच्चे का नाम था चुनुआ। चुनुआ था बड़ा जिद्दी और जल्दबाज।

हाँ, तो एक बार की बात है। चुहिया खाना बना रही थी। चुनुआ को जोरों की
भूख लगी थी। वह जल्दबाज तो था ही, मचाने लगा उधम-लगा रोने और चिल्लाने -

चुनुआ- अम्मां मुझको भूख लगी है, जल्दी दो कुछ खाने को।

कल तुम जो पपड़ी लाईं थीं, लाओ मुझे चबाने को।।

चुहिया ने उसे समझाया। कहा - बेटे, पपड़ी तो कल ही खत्म हो गई थी। अभी
खाना बना जाता है, मजे से खाना।

चुनुआ ठहरा जिद्दी। वह नहीं माना। रोने लगा कसकर ।

चुनुआ- देर मत करो जल्दी लाओ, पेट हमारा देखो तो।

इसमें चूहे कूद रहें हैं, जल्दी कुछ खाने को दो।।

चुनुआ रो रहा था, तभी वहां से एक बिल्ला गुजरा। 

जब उसने सुना कि चुनुआ के पेट में चूहे कूद रहे हैं तो फूला नहीं समाया। उसने सोचा, ‘अरे वाह! चूहे के पेट में चूहे। आज तो एक ही चूहा खाने से मेरा पेट भर जाएगा। बिल्ला मक्कार तो होता ही है। वह आवाज बदल कर गाने लगा -


बिल्ला- बिन पैसे मैं लड्डू बांटू, जिसको खाना हो आए।
जितने खा पाए खा जाए, चाहे तो घर ले जाए।।
रुन्नुक झुन्ना रुन्नुक झुन, झुन्नुक झुन्ना झुन्नुक झुन।।

लड्डू का नाम सुनकर चुनुआ उछलने लगा। वह चुहिया से बोला -

चुनुआ- अम्मां लड्डू वाला आया, मैं तो बाहर जाऊंगा।

हप-हप लड्डू, गप-गप लड्डू, आज पेट भर खाऊंगा।।

ताक लग गई झम्मक झम, लड्डू खाऊं छम्मक छम।।

चुहिया ने उसे रोका, ‘‘नहीं चुनुआ, बाहर मत जाना। यह जरूर कोई चालबाज ठग
है।’’ लेकिन चुनुआ भला क्यों मानता। वह तेजी से भागते हुए बोला -

चुनुआ- अब न सुनूं बात मैं कोई,
 लड्डू मुझको खाने दो।

भूख लगी है मुझको भारी,
 मुझको भूख मिटाने दो।।

चुनुआ बाहर गया। लेकिन वहां तो कोई नहीं था। चुनुआ आगे बढ़ा, और आगे बढ़ा ... ... और बढ़ा ... फिर लार टपकाते हुए बोला -

चुनुआ- आहा लड्डू, वाहा लड्डू , 
लड्डू वाले आओ न।

मैं लड्डू खाने आया हूँ, 
लड्डू मुझे खिलाओ न।।

बिल्ला झाड़ी में छिपा बैठा था। आवाज बदल कर वह बोला -

बिल्ला- आंख बंद कर लो पहले तुम, 
लड्डू तभी खिलाऊंगा।

पांच किलो लड्डू हैं ये सब, 
अभी तुम्हें दे जाऊंगा।।

चुनुआ ने तुरंत आंखें बंद कर लीं। 
मारे खुशी के वह ठुमकने लगा -

चुनुआ- चप्पर-चप्पर, चपर-चपर, 
लड्डू खाऊं हपर-हपर।

आंख बंद कर लीं हैं मैंने, 
जल्दी कर अब जल्दी कर।।

इधर चुनुआ ने आंखें बंद की और उधर बिल्ला ने लपक कर उसे धर पकड़ा। 
अपने पंजे उसके शरीर मे गड़ाते हुए वह हँसा -
बिल्ला- न्यारा चूहा हाथ लगा, प्यारा चूहा हाथ लगा,

पेट में इसके चूहे हैं, खूब बेचारा हाथ लगा,

अब मैं इसको खाऊंगा, बड़ा मजा पाऊंगा।

मारे दर्द के चुनुआ तड़पने लगा। रोते हुए वह चिल्लाया-

चुनुआ- मुझे न खाओ, मुझे न खाओ, हाए मैं मर जाऊंगा,

मुझको छोड़ो, मुझको छोड़ो, मैं न लड्डू खाऊंगा।

छोड़ो छोड़ जल्दी छोड़ो, मुझे बचाओ कोई दौड़ो।।

तब तक चुनुआ को खोजते-खोजते चुहिया वहां आ गई। चुनुआ की हालत देख वह बिलख उठी। सौभाग्य से वहीं पर कुत्ते दादा का घर था। 
चुहिया ने जोर से चिल्लाते हुए उन्हें पुकारा -

चुहिया- कुत्ते दादा, कुत्ते दादा, जल्दी दौड़ो जल्दी आओ,

चुनुआ को बिल्ला ने पकड़ा, आओ जल्दी इसे छुड़ाओ।

चीख सुनकर कुत्ते दादा तुरंत आए। 

बिल्ले को देखकर वह भौंके-

कुत्ते दादा- भौं-भौं बिल्ले ओ रे बिल्ले, 
चुनुआ को तू छोड़ फटाफट,

मार तुझे डालूंगा वर्ना, 
पी जाऊंगा खून गटागट।।

बिल्ला डर गया। उसने चुनुआ को छोड़ा और दुम दबाकर भागा। 
चुनुआ की जान में जान आई। चुहिया ने कुत्ते दादा का आभार व्यक्त किया।
 चुनुआ अपनी करनी पर बहुत दुखी था। वह रोते हुए बोला -

चुनुआ- अम्मां मैंने मनमानी की, कितनी गंदी शैतानी की।

शैतानी का फल पाया, देखो खून निकल आया।।

अम्मां माफ मुझे कर दो, दादा माफ मुझे कर दो,

कर दो माफ मुझे दादा, लो करता हूँ मैं वादा -

बात बड़ों की मानूंगा, कभी नहीं जिद ठानूंगा,

धैर्य सदा अपनाऊंगा, लालच में न आऊंगा।

चुनुआ की बात सुनकर चुहिया और कुत्ते दादा बहुत खुश हुए।

 चुहिया बोली-चल, तुझे खाना खिलाऊं।

चुनुआ- माँ दादा को भी तो साथ ले चलो। आज हम सब साथ-साथ खाना खाएंगे।

सब खुश होकर चल दिए।

(समाप्त)





* डॉ. नागेश पांडेय 'संजय 

शनिवार, 9 नवंबर 2013

दीवाली और नयी भाभी

कहानी : डा. नागेश पांडेय 'संजय'

मोनू का मन अनमना था। अनमना इसलिए कि अब तो पक्का हो ही गया था कि दीवाली पर भाभी चली जाएँगी।
जी हाँ, नई-नवेली भाभी: अबूझ पहेली भाभी।
प्यारी भाभी: दुलारी भाभी।
हंसाने  वाली भाभी: गुदगुदाने वाली भाभी।
खुले दिमाग की भाभी: लाजबाब भाभी।
मगर असली बात यह कि भाभी दीवाली पर अपने मायके चली जाएँगी।
वैसे जाएँ भी क्यों न ? उनकी नई-नई तो शादी हुई है। इस घर में आए हुए उन्हें बमुश्किल दो महीने ही हुए हैं। वैसे यह बात अलग है कि दो महीने में ही आल इन वन भाभी पूरे घर में छा गई हैं। बाबा से लेकर दादी तक, पापा से लेकर मम्मी तक और बुआ, ताऊ-ताई और यहाँ तक कि पड़ोस की शर्मा आंटी, गुप्ता आंटी की भी चहेती हैं भाभी। इस समय अगर वोटिंग करा दी जाएँ तो पक्का है कि जीत तो भाभी की ही होगी।
लेकिन भाभी के मायके जाने की बात सोच कर मोनू अनमना है। दीवाली पर धमा-चैकड़ी को लेकर क्या-क्या सोच रखा था उसने। कितनी तो कहानियाँ, और कहानियाँ क्या बचपन की दीवाली की बातें भाभी ने सुना रखीं थी और तभी तो मोनू को लगा था कि इस बार तो दीवाली का कुछ और ही मजा होगा लेकिन ....
दरअसल भाभी का तो स्टाइल ही कुछ अलग है बस... उनके साथ बैठ भर जाओ तो हास्य योगा फेल है। जी हाँ, सुबह घर के सारे लोग जब टहलने जाते हैं तो रास्ते में राजा पार्क में ढेर सारे लोग हा हा हा करते दिख जाते हैं। दादाजी ने बताया था कि यह बाबा रामदेव का हास्य योगा है। सब जबरदस्ती हँसते हैं। मगर भाभी के साथ जब हँसने की नौबत आती है तो पेट में बल पड़ जाएँ। नेचुरल हंसी।
भाभी के आने से पहले तो शायद ही कोई दिन जाता हो जब चुलबुल के साथ मोनू का झगड़ा न होता हो। मगर जादू किया है... जी हाँ, जादू। दोनों लव और कुश बन गए हैं।
मोनू को श्रीरामजी के पुत्रों लव-कुश के  साहस और आपसी प्रेम कहानी भी भाभी ने ही सुनाई थी। नही तो उसके
 कोर्स में तो सब विदेशी कहानियाँ हैं। हों  भी क्यों न ? हिन्दी विषय तो उसके पास है नही।  इंग्लिश मीडियम में पढ़ता है, कक्षा पाँच में। घर में ऐसा माहौल नहीं कि कहानी-वहानी सुनने को मिले। पापा-मम्मी दोनों टीचर हैं। पापा तो यहाँ रहते भी नहीं। उनकी पोस्टिंग अजमेर में है। बाबा और चाचा की दुकान है। देर शाम को घर आते हैं। दादी को तो कथा और प्रवचन वाले सीरियल अच्छे लगते है। चाची ने ब्यूटी पार्लर खोल रखा है। बुआ भी उनके साथ रहती हैं और बचे भइया... तो वे तो इंजीनियर हैं। मगर वे ज्यादा बिजी नहीं रहते। भाभी भी कहती हैं कि उतना कमाओ, जितने में दाल-रोटी आराम से चलती रहे। केवल कमाने-कमाने के चक्क्कर में जिंदगी की और खुशियाँ कुर्बान नहीं होनी चाहिए। जीवन अनमोल है। बार-बार नही मिलता और हम लोग आपाधापी में जीवन को खिलवाड़ बना कर रख देते है।
तो अब मोनू और चुलबुल लड़ते नहीं, मिलकर रहते हैं। और इसका पूरा श्रेय भाभी को जाता है। दोनों शाम को बैठ कर कहानी सुनते हैं। टिपटिपा, गहबर गौवा, सुखनिंदिया, लखटकिया और पता नहीं कितनी सारी मजेदार कहानियां और इसके लिए भाभी ने शर्त रखी थी कि अगर तुम लोग लड़े-झगड़े तो कहानी कभी नही सुनाऊँगी।
और फिर वाकई दोनों ने मेल जोल से रहना शुरू कर दिया था।
भाभी का वादा था कि दीवाली पर वह एक प्यारी सी कहानी सुनाएंगी।  
दीवाली पर तो पापा भी आ रहे थे। घर तो तब ही घर लगता है कि जब सबके सब एक ही जगह हों।
चुलबुल मोनू से छोटा है और थोड़ा तुतलाता है, उसे भी यह जानकर अच्छा नही लगा कि भाभी जा रही हैं। मोनू से बोला, ‘‘वाई (भाई) आपतो पता है ति भाभी दा लही हैं।‘‘
‘‘हां, पता है।‘‘
‘‘तो आओ उनछे बात कलें।‘‘
‘‘क्यों हमारे कहने से क्या होगा ?‘‘ थोड़ा रुककर मोनू बोला-‘‘भाभी के पापा उन्हें लेने आ रहें हैं और दादाजी ने भी हाँ कर दी है।‘‘
‘‘तलो तो। बात तो कलोगे ?‘‘
दोनों भाभी के कमरे की ओर हो लिए।
वहां गए तो देखा कि ढेर सारा पुराना समान फैला पड़ा है। भाभी चहकीं, ‘‘अरे हम तो तुम दोनों का ही इंतजार कर रहे थे।‘‘
‘‘त्यों बेकाल का थामान फितवाना है तबी ?‘‘ चुलबुल बोल पड़ा।
‘‘नही, ये बेकार का समान नही है और इसे फेंकना नही है।‘‘
‘‘क्यों ? आप इसका क्या करेंगी ?‘‘
‘‘बस देखते जाओ। इससे क्या-क्या बनेगा ?‘‘
दोनों ने बड़े ही कौतूहल से आंखे उस बिखरे समान की ओर गड़ा दीं। ग्लास, शीशियां, खाली बोतलें, प्लास्टिक बैग, पुराने कार्ड, रुई, पुराने कपड़े, गत्ते, गिफ्ट के पुराने रैपर, तार, फ्यूज बल्ब, सिलेंडर की टूटी नली, टूटे खिलौने, रददी पेपर, बेकार हो चुके पेन, बटन और पता नहीं क्या-क्या अगड़म-बगड़म।
‘‘समझ गया, ये सब कबाड़वाले को देना है न ?‘‘
‘‘अरे नहीं।‘‘
‘‘तो फिर आप इसका क्या करेंगी ?‘‘
‘‘बस देखते जाओ। हाथ बटाओ।‘‘
‘‘बताओ न भाभी ?‘‘
‘‘इछछे त्या बनाओदी ?‘‘
दोनों भूल गए कि वे यहां क्यों आए थे।
भाभी ने कहा कि इनसे तो बहुत सी चीजें बन सकती हैं मगर फिलहाल अभी तो हम दीवाली पर काम आने वाली कुछ चीजें बनाएंगे।‘‘
और कोई एक घंटे में कमाल हो गया।
पता है क्या-क्या बना ?
प्यारे से गणेशजी, कंदील, नकली फूलों का गमला, चमचमाती झालर, हाथी और उसकी पीठ पर एक टोकरी।
‘‘वाह भाभी, गैस सिलेंडर की खराब नली से बनी हाथी की सूंड़ के क्या कहने।‘‘
‘‘हां, और इस टोकरी में पूजा का सामान रखेंगे।‘‘
चुलबुल ताली बजाकर गाने लगा, दय गनेथ देवा। माता जाकी पालवती ....
मोनू ने पूछा, ‘‘लेकिन भाभी, बल्ब से कुछ नहीे बनाया ?‘‘
‘‘ इससे बाद में रुई की सहायता से चूजे बनाएंगे। अभी तो बहुत कुछ बनेगा जी।‘‘
‘‘वाह भाभी, दीवाली पर और वैसे भी कबाड़ के नाम पर ऐसी कितनी चीजें फेंक दी जाती हैं। पर आपने तो जादू कर दिया। इसे कहते हैं रियूज आफ वेस्ट मेटेरियल।‘‘
‘‘एक दादू औल कलो ना भाभी ?‘‘ चुलबुल को अब असली काम याद आया।
‘‘क्या ?‘‘
‘‘दीवाली पल यहीं लहो न भाभी प्लीद।‘‘
‘‘मैं तहां दा लही हूं ?‘‘ भाभी ने भी उसी की तरह तुतलाकर जबाव दिया।
‘‘क्यों आपके पापाजी आ रहे हैं बुलाने। कल शाम को दादाजी कह रहे थे!‘‘
‘‘हां, और आज सुबह पापाजी का फोन मेरे पास आया था कि वे नहीं आएंगे अभी। सब लोग उड़ीसा जा रहे हैं, जगन्नाथ पुरी।‘‘
‘‘सच्ची भाभी ?‘‘
‘‘नहीं झूंठी।‘‘
और सब पूरी मस्ती के साथ हंस पड़े।

डा. नागेश पांडेय ’संजय‘



गुरुवार, 10 अक्तूबर 2013

चालू लालू

शिशुगीत : डॉ. नागेश पांडेय 'संजय'
लालू जी शैतान बहुत हैं, 
चालू  भी हैं ये.
अपना काम बना लेते 
झगड़ालू भी हैं ये. 
मूंगफली मैंने दिलवायीं, 
दाने गटक गए.
मैंने मांगी मूंगफली तो
छिलके पटक गए