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सोमवार, 14 मार्च 2016

मोटा शलजम छोटा शलजम-डॉ. नागेश पांडेय 'संजय'


मोटा शलजम,
 छोटा शलजम।

 ले लो भैया!
 बेच रहे हम।
 दोनों के ही,
 रेट फिक्स हैं।
 भाव न होगा,
 बिल्कुल भी कम।



 मोटा शलजम,
 भारी भरकम।
 छोटा शलजम
 वजन बहुत कम।
 लेना है तो
 जल्दी बोलो,
 वरना जाएँ
और कहीं हम।
*******
चित्र में रावेन्द्र कुमार रवि 



गुरुवार, 14 जनवरी 2016

हास्य नाट्य रूपक : चूहे के पेट में चूहे कूदे - डाॅ. नागेश पांडेय ‘संजय’

चूहे के पेट में चूहे कूदे
*****************-
- डाॅ. नागेश पांडेय ‘संजय’



(इस हास्य नाट्य रूपक में केवल 5 पात्र हैं। बच्चे इनका अभिनय सहजता से कर सकते हैं। नेपथ्य में उदघोषक तोता जी  कथा को प्रस्तुत करेंगे और पात्र उनके कथनानुसार अनुकरण/ अभिनय करेंगे। संवाद अभिनय कर रहे बच्चे भी बोल सकते हैं अथवा वाचक ही संवादों को भी बोलते रहेंगे और बच्चे उसके अनुरूप अभिनय करते रहेगे।)

स्थान - बरगद का पेड़। उसके नीचे एक घर। (यह द्रश्य परदे के माध्यम से भी सम्भव है। पेड़ कोई और भी हो सकता है। जैसी सुविधा रहे। मंच की सज्जा अपनी सुविधानुसार की जा सकती है ।)

पात्र - 
चुनुआ- नन्हा चूहा
चुहिया- चुनुआ की मम्मी
बिल्ला- धूर्त बिल्ला
कुत्ते दादा- 

समय- दोपहर 
------------------

बरगद के पेड़ के नीचे एक बिल था। उसमें एक चुहिया रहती थी। उसका नन्हा-सा एक बच्चा था। बच्चे का नाम था चुनुआ। चुनुआ था बड़ा जिद्दी और जल्दबाज।

हाँ, तो एक बार की बात है। चुहिया खाना बना रही थी। चुनुआ को जोरों की
भूख लगी थी। वह जल्दबाज तो था ही, मचाने लगा उधम-लगा रोने और चिल्लाने -

चुनुआ- अम्मां मुझको भूख लगी है, जल्दी दो कुछ खाने को।

कल तुम जो पपड़ी लाईं थीं, लाओ मुझे चबाने को।।

चुहिया ने उसे समझाया। कहा - बेटे, पपड़ी तो कल ही खत्म हो गई थी। अभी
खाना बना जाता है, मजे से खाना।

चुनुआ ठहरा जिद्दी। वह नहीं माना। रोने लगा कसकर ।

चुनुआ- देर मत करो जल्दी लाओ, पेट हमारा देखो तो।

इसमें चूहे कूद रहें हैं, जल्दी कुछ खाने को दो।।

चुनुआ रो रहा था, तभी वहां से एक बिल्ला गुजरा। 

जब उसने सुना कि चुनुआ के पेट में चूहे कूद रहे हैं तो फूला नहीं समाया। उसने सोचा, ‘अरे वाह! चूहे के पेट में चूहे। आज तो एक ही चूहा खाने से मेरा पेट भर जाएगा। बिल्ला मक्कार तो होता ही है। वह आवाज बदल कर गाने लगा -


बिल्ला- बिन पैसे मैं लड्डू बांटू, जिसको खाना हो आए।
जितने खा पाए खा जाए, चाहे तो घर ले जाए।।
रुन्नुक झुन्ना रुन्नुक झुन, झुन्नुक झुन्ना झुन्नुक झुन।।

लड्डू का नाम सुनकर चुनुआ उछलने लगा। वह चुहिया से बोला -

चुनुआ- अम्मां लड्डू वाला आया, मैं तो बाहर जाऊंगा।

हप-हप लड्डू, गप-गप लड्डू, आज पेट भर खाऊंगा।।

ताक लग गई झम्मक झम, लड्डू खाऊं छम्मक छम।।

चुहिया ने उसे रोका, ‘‘नहीं चुनुआ, बाहर मत जाना। यह जरूर कोई चालबाज ठग
है।’’ लेकिन चुनुआ भला क्यों मानता। वह तेजी से भागते हुए बोला -

चुनुआ- अब न सुनूं बात मैं कोई,
 लड्डू मुझको खाने दो।

भूख लगी है मुझको भारी,
 मुझको भूख मिटाने दो।।

चुनुआ बाहर गया। लेकिन वहां तो कोई नहीं था। चुनुआ आगे बढ़ा, और आगे बढ़ा ... ... और बढ़ा ... फिर लार टपकाते हुए बोला -

चुनुआ- आहा लड्डू, वाहा लड्डू , 
लड्डू वाले आओ न।

मैं लड्डू खाने आया हूँ, 
लड्डू मुझे खिलाओ न।।

बिल्ला झाड़ी में छिपा बैठा था। आवाज बदल कर वह बोला -

बिल्ला- आंख बंद कर लो पहले तुम, 
लड्डू तभी खिलाऊंगा।

पांच किलो लड्डू हैं ये सब, 
अभी तुम्हें दे जाऊंगा।।

चुनुआ ने तुरंत आंखें बंद कर लीं। 
मारे खुशी के वह ठुमकने लगा -

चुनुआ- चप्पर-चप्पर, चपर-चपर, 
लड्डू खाऊं हपर-हपर।

आंख बंद कर लीं हैं मैंने, 
जल्दी कर अब जल्दी कर।।

इधर चुनुआ ने आंखें बंद की और उधर बिल्ला ने लपक कर उसे धर पकड़ा। 
अपने पंजे उसके शरीर मे गड़ाते हुए वह हँसा -
बिल्ला- न्यारा चूहा हाथ लगा, प्यारा चूहा हाथ लगा,

पेट में इसके चूहे हैं, खूब बेचारा हाथ लगा,

अब मैं इसको खाऊंगा, बड़ा मजा पाऊंगा।

मारे दर्द के चुनुआ तड़पने लगा। रोते हुए वह चिल्लाया-

चुनुआ- मुझे न खाओ, मुझे न खाओ, हाए मैं मर जाऊंगा,

मुझको छोड़ो, मुझको छोड़ो, मैं न लड्डू खाऊंगा।

छोड़ो छोड़ जल्दी छोड़ो, मुझे बचाओ कोई दौड़ो।।

तब तक चुनुआ को खोजते-खोजते चुहिया वहां आ गई। चुनुआ की हालत देख वह बिलख उठी। सौभाग्य से वहीं पर कुत्ते दादा का घर था। 
चुहिया ने जोर से चिल्लाते हुए उन्हें पुकारा -

चुहिया- कुत्ते दादा, कुत्ते दादा, जल्दी दौड़ो जल्दी आओ,

चुनुआ को बिल्ला ने पकड़ा, आओ जल्दी इसे छुड़ाओ।

चीख सुनकर कुत्ते दादा तुरंत आए। 

बिल्ले को देखकर वह भौंके-

कुत्ते दादा- भौं-भौं बिल्ले ओ रे बिल्ले, 
चुनुआ को तू छोड़ फटाफट,

मार तुझे डालूंगा वर्ना, 
पी जाऊंगा खून गटागट।।

बिल्ला डर गया। उसने चुनुआ को छोड़ा और दुम दबाकर भागा। 
चुनुआ की जान में जान आई। चुहिया ने कुत्ते दादा का आभार व्यक्त किया।
 चुनुआ अपनी करनी पर बहुत दुखी था। वह रोते हुए बोला -

चुनुआ- अम्मां मैंने मनमानी की, कितनी गंदी शैतानी की।

शैतानी का फल पाया, देखो खून निकल आया।।

अम्मां माफ मुझे कर दो, दादा माफ मुझे कर दो,

कर दो माफ मुझे दादा, लो करता हूँ मैं वादा -

बात बड़ों की मानूंगा, कभी नहीं जिद ठानूंगा,

धैर्य सदा अपनाऊंगा, लालच में न आऊंगा।

चुनुआ की बात सुनकर चुहिया और कुत्ते दादा बहुत खुश हुए।

 चुहिया बोली-चल, तुझे खाना खिलाऊं।

चुनुआ- माँ दादा को भी तो साथ ले चलो। आज हम सब साथ-साथ खाना खाएंगे।

सब खुश होकर चल दिए।

(समाप्त)





* डॉ. नागेश पांडेय 'संजय 

शनिवार, 9 नवंबर 2013

दीवाली और नयी भाभी

कहानी : डा. नागेश पांडेय 'संजय'

मोनू का मन अनमना था। अनमना इसलिए कि अब तो पक्का हो ही गया था कि दीवाली पर भाभी चली जाएँगी।
जी हाँ, नई-नवेली भाभी: अबूझ पहेली भाभी।
प्यारी भाभी: दुलारी भाभी।
हंसाने  वाली भाभी: गुदगुदाने वाली भाभी।
खुले दिमाग की भाभी: लाजबाब भाभी।
मगर असली बात यह कि भाभी दीवाली पर अपने मायके चली जाएँगी।
वैसे जाएँ भी क्यों न ? उनकी नई-नई तो शादी हुई है। इस घर में आए हुए उन्हें बमुश्किल दो महीने ही हुए हैं। वैसे यह बात अलग है कि दो महीने में ही आल इन वन भाभी पूरे घर में छा गई हैं। बाबा से लेकर दादी तक, पापा से लेकर मम्मी तक और बुआ, ताऊ-ताई और यहाँ तक कि पड़ोस की शर्मा आंटी, गुप्ता आंटी की भी चहेती हैं भाभी। इस समय अगर वोटिंग करा दी जाएँ तो पक्का है कि जीत तो भाभी की ही होगी।
लेकिन भाभी के मायके जाने की बात सोच कर मोनू अनमना है। दीवाली पर धमा-चैकड़ी को लेकर क्या-क्या सोच रखा था उसने। कितनी तो कहानियाँ, और कहानियाँ क्या बचपन की दीवाली की बातें भाभी ने सुना रखीं थी और तभी तो मोनू को लगा था कि इस बार तो दीवाली का कुछ और ही मजा होगा लेकिन ....
दरअसल भाभी का तो स्टाइल ही कुछ अलग है बस... उनके साथ बैठ भर जाओ तो हास्य योगा फेल है। जी हाँ, सुबह घर के सारे लोग जब टहलने जाते हैं तो रास्ते में राजा पार्क में ढेर सारे लोग हा हा हा करते दिख जाते हैं। दादाजी ने बताया था कि यह बाबा रामदेव का हास्य योगा है। सब जबरदस्ती हँसते हैं। मगर भाभी के साथ जब हँसने की नौबत आती है तो पेट में बल पड़ जाएँ। नेचुरल हंसी।
भाभी के आने से पहले तो शायद ही कोई दिन जाता हो जब चुलबुल के साथ मोनू का झगड़ा न होता हो। मगर जादू किया है... जी हाँ, जादू। दोनों लव और कुश बन गए हैं।
मोनू को श्रीरामजी के पुत्रों लव-कुश के  साहस और आपसी प्रेम कहानी भी भाभी ने ही सुनाई थी। नही तो उसके
 कोर्स में तो सब विदेशी कहानियाँ हैं। हों  भी क्यों न ? हिन्दी विषय तो उसके पास है नही।  इंग्लिश मीडियम में पढ़ता है, कक्षा पाँच में। घर में ऐसा माहौल नहीं कि कहानी-वहानी सुनने को मिले। पापा-मम्मी दोनों टीचर हैं। पापा तो यहाँ रहते भी नहीं। उनकी पोस्टिंग अजमेर में है। बाबा और चाचा की दुकान है। देर शाम को घर आते हैं। दादी को तो कथा और प्रवचन वाले सीरियल अच्छे लगते है। चाची ने ब्यूटी पार्लर खोल रखा है। बुआ भी उनके साथ रहती हैं और बचे भइया... तो वे तो इंजीनियर हैं। मगर वे ज्यादा बिजी नहीं रहते। भाभी भी कहती हैं कि उतना कमाओ, जितने में दाल-रोटी आराम से चलती रहे। केवल कमाने-कमाने के चक्क्कर में जिंदगी की और खुशियाँ कुर्बान नहीं होनी चाहिए। जीवन अनमोल है। बार-बार नही मिलता और हम लोग आपाधापी में जीवन को खिलवाड़ बना कर रख देते है।
तो अब मोनू और चुलबुल लड़ते नहीं, मिलकर रहते हैं। और इसका पूरा श्रेय भाभी को जाता है। दोनों शाम को बैठ कर कहानी सुनते हैं। टिपटिपा, गहबर गौवा, सुखनिंदिया, लखटकिया और पता नहीं कितनी सारी मजेदार कहानियां और इसके लिए भाभी ने शर्त रखी थी कि अगर तुम लोग लड़े-झगड़े तो कहानी कभी नही सुनाऊँगी।
और फिर वाकई दोनों ने मेल जोल से रहना शुरू कर दिया था।
भाभी का वादा था कि दीवाली पर वह एक प्यारी सी कहानी सुनाएंगी।  
दीवाली पर तो पापा भी आ रहे थे। घर तो तब ही घर लगता है कि जब सबके सब एक ही जगह हों।
चुलबुल मोनू से छोटा है और थोड़ा तुतलाता है, उसे भी यह जानकर अच्छा नही लगा कि भाभी जा रही हैं। मोनू से बोला, ‘‘वाई (भाई) आपतो पता है ति भाभी दा लही हैं।‘‘
‘‘हां, पता है।‘‘
‘‘तो आओ उनछे बात कलें।‘‘
‘‘क्यों हमारे कहने से क्या होगा ?‘‘ थोड़ा रुककर मोनू बोला-‘‘भाभी के पापा उन्हें लेने आ रहें हैं और दादाजी ने भी हाँ कर दी है।‘‘
‘‘तलो तो। बात तो कलोगे ?‘‘
दोनों भाभी के कमरे की ओर हो लिए।
वहां गए तो देखा कि ढेर सारा पुराना समान फैला पड़ा है। भाभी चहकीं, ‘‘अरे हम तो तुम दोनों का ही इंतजार कर रहे थे।‘‘
‘‘त्यों बेकाल का थामान फितवाना है तबी ?‘‘ चुलबुल बोल पड़ा।
‘‘नही, ये बेकार का समान नही है और इसे फेंकना नही है।‘‘
‘‘क्यों ? आप इसका क्या करेंगी ?‘‘
‘‘बस देखते जाओ। इससे क्या-क्या बनेगा ?‘‘
दोनों ने बड़े ही कौतूहल से आंखे उस बिखरे समान की ओर गड़ा दीं। ग्लास, शीशियां, खाली बोतलें, प्लास्टिक बैग, पुराने कार्ड, रुई, पुराने कपड़े, गत्ते, गिफ्ट के पुराने रैपर, तार, फ्यूज बल्ब, सिलेंडर की टूटी नली, टूटे खिलौने, रददी पेपर, बेकार हो चुके पेन, बटन और पता नहीं क्या-क्या अगड़म-बगड़म।
‘‘समझ गया, ये सब कबाड़वाले को देना है न ?‘‘
‘‘अरे नहीं।‘‘
‘‘तो फिर आप इसका क्या करेंगी ?‘‘
‘‘बस देखते जाओ। हाथ बटाओ।‘‘
‘‘बताओ न भाभी ?‘‘
‘‘इछछे त्या बनाओदी ?‘‘
दोनों भूल गए कि वे यहां क्यों आए थे।
भाभी ने कहा कि इनसे तो बहुत सी चीजें बन सकती हैं मगर फिलहाल अभी तो हम दीवाली पर काम आने वाली कुछ चीजें बनाएंगे।‘‘
और कोई एक घंटे में कमाल हो गया।
पता है क्या-क्या बना ?
प्यारे से गणेशजी, कंदील, नकली फूलों का गमला, चमचमाती झालर, हाथी और उसकी पीठ पर एक टोकरी।
‘‘वाह भाभी, गैस सिलेंडर की खराब नली से बनी हाथी की सूंड़ के क्या कहने।‘‘
‘‘हां, और इस टोकरी में पूजा का सामान रखेंगे।‘‘
चुलबुल ताली बजाकर गाने लगा, दय गनेथ देवा। माता जाकी पालवती ....
मोनू ने पूछा, ‘‘लेकिन भाभी, बल्ब से कुछ नहीे बनाया ?‘‘
‘‘ इससे बाद में रुई की सहायता से चूजे बनाएंगे। अभी तो बहुत कुछ बनेगा जी।‘‘
‘‘वाह भाभी, दीवाली पर और वैसे भी कबाड़ के नाम पर ऐसी कितनी चीजें फेंक दी जाती हैं। पर आपने तो जादू कर दिया। इसे कहते हैं रियूज आफ वेस्ट मेटेरियल।‘‘
‘‘एक दादू औल कलो ना भाभी ?‘‘ चुलबुल को अब असली काम याद आया।
‘‘क्या ?‘‘
‘‘दीवाली पल यहीं लहो न भाभी प्लीद।‘‘
‘‘मैं तहां दा लही हूं ?‘‘ भाभी ने भी उसी की तरह तुतलाकर जबाव दिया।
‘‘क्यों आपके पापाजी आ रहे हैं बुलाने। कल शाम को दादाजी कह रहे थे!‘‘
‘‘हां, और आज सुबह पापाजी का फोन मेरे पास आया था कि वे नहीं आएंगे अभी। सब लोग उड़ीसा जा रहे हैं, जगन्नाथ पुरी।‘‘
‘‘सच्ची भाभी ?‘‘
‘‘नहीं झूंठी।‘‘
और सब पूरी मस्ती के साथ हंस पड़े।

डा. नागेश पांडेय ’संजय‘



गुरुवार, 10 अक्तूबर 2013

चालू लालू

शिशुगीत : डॉ. नागेश पांडेय 'संजय'
लालू जी शैतान बहुत हैं, 
चालू  भी हैं ये.
अपना काम बना लेते 
झगड़ालू भी हैं ये. 
मूंगफली मैंने दिलवायीं, 
दाने गटक गए.
मैंने मांगी मूंगफली तो
छिलके पटक गए 

सोमवार, 16 सितंबर 2013

शलजम

शिशुगीत : डॉ. नागेश पांडेय 'संजय'
शलजम की सब्जी न्यारी,
खाती है दुनियाँ सारी.
दादी तो कच्चा खातीं, 
दादा खाते तरकारी. 
शलजम मुझको भाती है, 
शलजम खून बढ़ाती है.
शलजम जो तुम खाओगे, 
लाल लाल हो जाओगे.  


शनिवार, 20 जुलाई 2013

पापा जी का कंप्यूटर

 बाल कविता :नागेश  पांडेय 'संजय' 

पापा जी का कंप्यूटर है
जादू भरा पिटारा

इसमें हाथी, इसमें घोड़ा
इसमें भालू बंदर।
इसमें गेम अनोखे कितने
मैजिक इसके अंदरं
आन करो इंटरनेट, होगा
मुटठी में जग सारा।

जोड़, घटाना, गुणा, भाग सब
पलक झपकते कर लो।
मेमोरी के क्या कहने जी
जितना चाहे भर लो।
थकने का ता काम नहीं है
पहलवान यह ‘दारा‘।


पिक्चर बुक का क्या कहना जी
जमकर चि़त्र बनाओ।
गाने सुनो फिल्म भी देखो,
जी भर जी बहलाओ।
मैगजीन भी पढ़ो इसी पर,
सच्चा दोस्त तुम्हारा।

पापा जी का कंप्यूटर है
जादू भरा पिटारा

गुरुवार, 15 नवंबर 2012

मेरी नयी पुस्तक : जो बूझे वह चतुर सुजान


 पुस्तक :  जो बूझे वह चतुर सुजान : नागेश पांडेय 'संजय' 
ज्ञान विज्ञान प्रकाशन 
जी 72, द्वितीय तल, जगतपुरी, दिल्ली -32
मूल्य - 40/- 
संस्करण प्रथम 2012 

  
इसी पुस्तक से कुछ पहेलियाँ आपके लिए ....
1
ढोलक जैसा रूप हमारा,
पकड़ हाथ में मुझे बजाओ।
जो धुन निकले उसमें भैया ,
रू जोड़ो तो उत्तर पाओ।  
2
एक फली है अजब अनोखी,
टक्कर ले बादाम की।
नाम दाल का इसमें आता,
बड़ी बडाई दाम की।
3
एक अनोखी दुनिया मैंने
 देखी  लटकी पेड़ पर।
उस दुनियां के जितने वासी,
सबके अपने-अपने घर।
4
गोल शरीर, पेट में दांत,
गेहूं खूब चबाती हूँ।
लेकिन फिर भी भूखी रहती,
कभी न खुद खा पाती  हूँ।
उत्तर दीजिए ...टिप्पणी के रूप में ......