शाहजहांपुर जिले के मूल निवासी और बरेली के डा. राजेंद्र प्रसाद स्नातकोत्तर महाविद्यालय मीरगंज के शिक्षा विभागाध्यक्ष डा. नागेश पांडेय 'संजय' का कविता संग्रह 'तुम्हारे लिए...'., की भावभूमि भी कुछ इसी तरह की रही। जीवन के उतार चढ़ाव, बदलाव, विसंगतियां, अनुभूतियां, सुख-दुख का एहसास उनकी कविता का विषय बनते गए। डा. नागेश पांडेय की कृति के अध्ययन से साफ है कि उन्होंने बचपन से जवानी तक जो भोगा और महसूस किया उसे ही पृष्ठांकित कर डाला। इसीलिए उनकी हर रचना स्वयं में बोलती है। उन्होंने श्रृंगार के दोनों पक्षों को जिया है। एक ओर वह लिखते हैं-
मैं निरा पाषाण था, तुमने तराशा,
और मेरा रूप मन भावन गढ़ा है।
हूं प्रखर संपूर्ण इसका श्रेय तुमको,
क्या कहूं यह अनुग्रह कितना बड़ा है।
दूसरी और डा. नागेश के मन में कहीं न कहीं द्वंद्व भी है। एक गीत में वह यह भी लिखते हैं कि-
नेह का मग जगमगाओ, दीप धर दो,
क्या पता यह सांझ फिर आए न आए।
उनकी रचना प्रेम की आराधक है। उनकी यह पंक्ति इसको प्रमाणित करती है-
भले तुम पूजो मुझे भगवान कहकर,
किंतु मैं खुद को पुजारी मानता हूं।
कृति में संग्रहीत रचनाएं जिंदगी को परिभाषित करती हैं। अचेतनता में चेतना जगाती हैं। प्रेम की पावनता को उजागर कर जीवन को स्वर प्रदान करती है। इसीलिए पद्मश्री गोपालदास नीरज भी उनके संग्रह के बारे में लिखते हैं कि 'नागेश की रचनाएं हर प्रेमी हृदय के कंठ का रत्नहार बनेंगी।'


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भावों की माला गूँथ सकें,
वह कला कहाँ !
वह ज्ञान कहाँ !
व्यक्तित्व आपका है विराट्,
कर सकते हम
सम्मान कहाँ।
उर के उदगारों का पराग,
जैसा है-जो है
अर्पित है।